The window of my house or the soul, Manmarziyaan Magazine

The Manmarziyaan Magazine celebrated its first birthday in October 2021 in collaboration with Photobombaying and Iris Poetry. This poem is one of the two winning pieces.

By Kshitiz Kumar Singh

“सब रंग ओझल हो गए तवीर के, बस एक काला धब्बा सा मेरी ममता और जवानी का आज़ार
रह गया।”

चंद सवाल और इंसान अनकहे लफ़्ज़ों की भांति कब्र की गहराइयों में ही दफ़न रहने चाहिए,
रोज़ कफन की रंगत में छुपी आवाज़ को सुन पाने की जिज्ञासा उठती है।

रोज़ सडक़ पर चलते-चलते चप्पल की रगड़ और अपने २२ दिन के रंगत का चेहरा
सामने आता है,
जीवन ने कुछ ऐसा ही दृश्य प्रस्तुत करा है।

९ वर्ष की मेरी खुद की माँ का बचपन भी इन भेड़ियों ने अपनी सामाजिक परम्पराओ के
हवाले कर दिया था।
१८ वर्ष का मेरा बचपन कैसे कुछ अलग हो सकता था?

कभी-कभी अपने कमरे की दीवारों को घूरती यह बात पर विचार करती हूँ कि क्या कुछ अलग
हो सकता था?
दीवार में सीलन से पपड़ी निकल रही है।

जिस प्रकार मेरे आस पास की एक-एक औरत की रूह का एक-एक हिस्सा अंदर से तस्कीन
की तमन्ना भूल चुका हैं,
कुछ कहने को व्याकुल नहीं है।

दीवार से जुड़ी यह मनमोहक खिड़की आज़ादी का स्वरूप मालूम होती है।

तस्कीन जीने की, तस्कीन ज़िंदा रहने की।

इंसानियत से कोसो दूर उफ़ान पर दरिया और मेरे ‘घर’ किनारे पर मैं बीच में बैठी यह
सोचती हूँ की मेरी ज़ात का हासिल क्या होगा?

क्या उन कोमल अश्रुओं का इन लोगों की खाल पर कुछ असर होगा?
क्या मासूमियत का गला घोटने वाले इन दरिंदों का हिसाब होगा? गुस्से की तेग़ खून का हिसाब खून से करने को माँगती है!

अपने वजूद से जुड़े सवालों का जवाब देने का मतलब क्या है?

अपने विवाह का दिन याद आता है।
मंडप सजे थे, फूलों की बारात में जैसे इंसानो की आवाज़ खो सी गयी थी,वरमाला रूपी
बेड़ियो का जाल गले की साँस रोक रहा था।

कुछ हाफ़िज़ा आज अपने छोटे-छोटे हाथ पैरों की काया खोज रही है, कुछ खेल भी याद आते
हैं।

आई बाबा की ओर गुहार लगाने का अब मन नहीं है, किस्मत की रेखा पर मैंने चलना सीख
लिया था।

एक जीवन जिसकी कल्पना थी और एक जीवन जो असल था,
दायरा कुछ अधिक मालूम होता है,एक कुंठित इब्तिदा मैंने मान ली थी।

बताने को सारे किस्से अब मुर्दा से हैं, सारे सच जो झूठ हैं,
जैसे तय है शाम के बाद रात का आना,
सितारों का किसी तरीख का याद दिला जाना, सुबह एक आज़ादी की इच्छा का मर जाना।

दोपहर किसी मज़दूर का सीना दहक जाना,
जिस प्रकार मुंडेरों पर कबूतरों का डेरा उनकी क़ैद तय करता है, उसी प्रकार मेरा अस्तित्व
मेरी ग़ुलामी तय कर चुका है!

दिन बीत रहे है और हिम्मत जवाब दे रही है। इस समाज मे मेरी और मेरे रंगत की कोई जगह नहीं है,
इस खिड़की के आर पार की दुनिया की कल्पना करती हूँ, इन सबसे कही दूर जाने का मन
होता है।

मेरी ममता गुहार लगाती है, चीख़-चीख़ कर आवाज़ गुम सी हो गयी है,
खयाल बस इतना ही कि सब कुछ छोड़कर जाऊँ तो कहाँ?

१८ वर्ष की लड़की और १८ वर्ष की माँ में बहुत अंतर है।

कुछ तक़सीर भले के लिए करे जाते हैं, और मेरी माँ मुझसे कहती हैं-

“२७ वर्ष की अवस्था मे मुझे १८ वर्ष की लड़की और २२ दिन के नाती का भार स्वीकार करना
ही पड़ा।”

उनकी बातों से ज्ञात हुआ कि यह लड़ाई जो रोज़ मेरे मस्तिष्क में शुरू होकर वहीं धूमिल हो
जाती है, उसका कोई अर्थ नही है।

अकेले विदा लेती तो इस बच्चे का भविष्य भी इसके पिता का ही रूप लेता, और अकेले पालने
और बेहतर की उम्मीद मेरे बस में नही है।

जिस गोदी से पहली दफा उठाया था उससे ही आखिरी दफा छोड़ दिया।

शायद इस बच्चे की उम्र महज़ २२ दिन ही थी, खुद कूदने से पहले बस एक ही बात सताती है
और अंदर ही अंदर कहती है-
“जिस प्रकार इन लोगो ने मेरी नियति का चयन करा, यही पाप काश मुझे इसके साथ न करना
पड़ता”

मेरी मृत्यु के पश्चात आज भी मेरी माँ कहती है-
“सब रंग ओझल हो गए तस्वीर के, बस एक काला धब्बा सा मेरी ममता और जवानी का आज़ार
रह गया।”

यह रंगत मेरे लहू की थी, लहू जिसका अहसास हर मुजरिम की रूह में बसेगा, मेरे खुद के
भी।


Kshitiz Kumar Singh is a 20-year-old History undergraduate at the University of Delhi with an uncanny drift towards the essence of literature. From being a cinema connoisseur to being dipped into the world of mixed martial arts, you can usually spot him murmuring strange monologues from the latest flick on his mind or having an inspection of his favourite willow. An avid narrator and storyteller, he believes that art resonates the spirit to dwindle any to all misery alike, without employing a singular muscle to use.

Guest editor: Samiksha Purohit

Featured image credit: Photobombaying

Guest Writer

Guest Writers occasionally contribute to the magazine

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